श्रेष्ठता की बुलंदियों पर पहुँचते थे हम सभ्य और संस्कृत,
विकीर्ण सूर्य रश्मियों सी भारतीयता है विस्तृत।
सूर्य-सा तेज और रग-रग में शौर्य और कर्मठता से वीरप्रसू हैं माँ भारती,
रामायण, वेद पुराण और भगवद गीता जैसे नग-नदी रहेंगें सदा चिरस्थायी।
माँ सरस्वती के मंदिर में ज्ञानोदय से ही सर्वसृष्टि हुई आलौकित,
विविधता में एकता के संग कोटि-कोटि परम्पराएं रहती यहाँ प्रचलित ।
नभ से विशाल हृदया और प्रकृति से परोपकारी रहते यहाँ मनुज,
सप्तसिंधु से सप्तऋषि हुए यहाँ अवतरित जिससे न होंगे कम कदापि विवेक और सूझ-बुझ।
अद्वितीय, अतुलनीय, अनंत एवं अथाह है भारतवर्ष हमारा,
गगनचुंबी आदर्शों का पालनहारा,
धरा का स्वर्ग, सुवर्ण खग, और आँखों का सितारा।
मेरा यह प्रश्न है तुमसे कि क्या अंग्रेज़ो का प्रहार था इतना असाध्य ?
कि आज भी हम खा रहे पश्चिमी सभ्यता के खाद्य।
जितना गरिमामय था अतीत, क्या उतना ही गौरवशाली होगा भविष्य ?
हाँ, यदि त्याग पाश्चात्य सभ्यता को तुम मुड़े अपनी जड़ों की ओर तो होगा अवश्य ।
किन्तु यदि यह न हुआ संभव, तो विनाश है अवश्यंभावी।
जो यह सोचे कि आध्यात्मिकता पर हो सकती आधुनिकता विजयी, वह नर है अंधविश्वासी।
अभिमान नहीं, स्वदेशाभिमान करो, पाश्चात्य नहीं, भारतीय संस्कृति का पालन करो।
सोने की चिड़िया था भारत, सुवर्ण सिंह बनाना है।
तो चलो पुरुषार्थ करे, सगुण आज्ञा पालन करे, कर्तव्य परायण रहे और मनुष्यता पंथ-पथ पर अडिग रहे।
भारत की माटी से निर्मित है तो भारतीय रंग बनाए रखे।
– महक वि. मोढवाडिया

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